+ अब कर्त्ता नामक चौथा गुण चार गाथाओं द्वारा कहते हैं - -
जो णिक्खवणपवेसे सेज्जासंथारउवधिसंभोगे ।
ठाणणिसेज्जागासे अगदूण विकिंचणाहारे॥460॥
अब्भुज्जदचरियाए उवकारमणुत्तरं वि कुव्वंतो ।
सव्वादरसत्तीए वट्टइ परमाए भत्तीए॥461॥
इय अप्पपरिस्सममगणित्ता खवयस्स सव्वपडिचरणे ।
वट्टंतो आयरिओ पकुव्वओ णाम सो होइ॥462॥
आने-जाने खड़े-बैठने और उपकरण शोधन में ।
खान-पान अरु मल शोधन में जो प्रकृष्ट उपकार करें॥460॥
पण्डित मरण कार्य में आदर, शक्ति एवं भक्ति से ।
हस्तालम्बन दे उपकार करें, आचार्य प्रकुर्वक हैं॥461॥
निज-श्रम की परवाह न करते हुए सेवा सर्व प्रकार ।
करें क्षपक की जो आचार्य, प्रकारक उनको कहते हैं॥462॥
अन्वयार्थ : आचार्य इतने स्थानों में क्षपक का उपकार करते हैं - वसतिका से बाहर निकलने में, बाहर से भीतर प्रवेश कराने में, शय्या, वसतिका के शोधने में, संस्तर शोधने में, उपकरण शोधने में, खडे रखने में, बैठाने में, शरीर का मल दूर करने में, आहार करने के समय बहुत उद्यमपूर्वक सेवा करके, हस्तावलम्बनादि देकर, सर्व प्रकार से आदरपूर्वक, शक्ति से तथा परम भक्ति से, अपने परिश्रम को न गिनते हुए क्षपक की संपूर्ण वैयावृत्त्य में प्रवर्तमान जो आचार्य, वे प्रकर्त्ता नामक गुण के धारक होते हैं ।

  सदासुखदासजी