
खवओ किलामिदंगो पडिचरयगुणेण णिव्वुदिं लहइ ।
तम्हा णिव्विसिदव्वं खवएण पकुव्वयसयासे॥463॥
ग्लान शरीरी, रोग-ग्रस्त मुनि सेवा से सुख प्राप्त करे ।
अतः क्षपक सेवा-कर्त्ता आचार्य समीप निवास करे॥463॥
अन्वयार्थ : जिसका शरीर ग्लानरूप, पीडारूप है, ऐसे क्षपक के परिचारक/जो वैयावृत्त्य करनेवाले उनकी परिचर्या/सेवारूप गुण से वेदनारहित सुखी होते हैं । और वेदना न व्यापती हो, तब शुभध्यान शुभभावना में लीन होकर आत्मकल्याण करते हैं । इसलिए प्रकर्त्तागुणसहित गुरुओं के निकट ही साधु को देह त्याग करना श्रेष्ठ है ।
ऐसे सुस्थित नामक अधिकार में निर्यापक गुरुओं के अष्ट प्रकार के गुणों में प्रकर्त्ता नामक गुण चार गाथाओं में वर्णन किया ।
सदासुखदासजी