
खवयस्स तीरपत्तस्स वि गुरुगा होति रागदोसा हु ।
तम्हा छुहादिएहिं य खवयस्स विसोत्तिया होइ॥464॥
पहुँचा क्षपक भवोदधि-तीर परन्तु राग-द्वेष हों तीव्र ।
संक्लेश परिणाम क्षपक के भूख प्यास से हो पीड़ित॥464॥
अन्वयार्थ : तीर अर्थात् संसार का अन्त अथवा वर्तमान मनुष्यपर्याय के अन्त को प्राप्त हुए जो क्षपक उन्हें क्षुधा-तृषा, रोग-वेदनादि से तीव्र राग-द्वेष होते हैं और राग-द्वेष की तीव्रता से क्षपक के परिणाम चलायमान होते हैं/अशुभ परिणाम होते हैं ।
सदासुखदासजी