
थोणाइदूण पूव्वं तप्पडिवक्खं पुणो वि आवण्णो ।
खवओ तं तह आलोचेदुं लज्जेज्ज गारविदो॥465॥
गुरु से दोष कहूँ - एेसा संकल्प करे पर होवे मान ।
आलोचना समय वह मुनि लज्जा-गारव1 को होता प्राप्त॥465॥
अन्वयार्थ : दीक्षा ली है, उस दिन से लेकर आज पर्यंत रत्नत्रय में जो अतिचार लगे हों, उन सबका निवेदन करूँगा, गुरुओं को बताऊँगा - ऐसी पहले से ही प्रतिज्ञा करने के पश्चात् प्रतिपक्षी/अभिमान भयादि को प्राप्त होकर और यथावत् आलोचना करने में लज्जावान होते हैं या गौरव/गारव सहित होकर यथावत् आलोचना करने में लज्जा के कारण आलोचना नहीं करते ।
सदासुखदासजी