तो सो हीलणभीरू पूयाकामो ठवेणइत्तो य ।
णिज्जूहणभीरू वि य खवओ विनदो वि णालोचे॥466॥
अतः अवज्ञा-भीरु तथा पूजाकामी2 स्थापितकामी3 ।
त्याग भीरु4 वह क्षपक कहे नहिं गुुरु से अपने दोषों को॥466॥
अन्वयार्थ : पश्चात् लज्जावान होकर चिंतवन करते हैं कि गुरु मेरा अपराध जान लेंगे तो मेरी अवज्ञा कर देंगे - ऐसे हीलनभीरु/हृदय में भयभीत होकर तथा ये मुझे ऐसा अपराधी जानेंगे तो वंदना, सत्कार, उठकर खडे होना आदि नहीं करेंगे, ऐसे पूजा के इच्छुक होकर, मुझे अपराधी जानेंगे तो मेरा त्याग कर देंगे, संघ से बाहर कर देंगे ।

  सदासुखदासजी