+ इसप्रकार अपने को सुन्दर चारित्र के धारण करनेवालों में स्थापने के इच्छुक होकर जो मुनि अपना दोष गुरुओं से नहीं कहें तो गुरु क्या करते हैं? यह कहते हैं - -
तस्स अवायोपायविदंसी खवयस्स ओघपण्णवओ ।
आलोचेंतस्स अणुज्जगस्स दंसेइ गुणदोसे॥467॥
अतः अनालोचक अथवा माया से आलोचक मुनि को ।
लाभालाभ प्रदर्शक सूरि अनालोचन के दोष कहें॥467॥
अन्वयार्थ : जो क्षपक यथावत् आलोचना नहीं करते तो अपायोपायविदर्शी जो गुरु हैं, वे सामान्य प्ररूपणा करते हुए मायाचार सहित आलोचना करनेवालों के गुण-दोष दिखाते हैं ।

  सदासुखदासजी