
दुक्खेण लहइ जीवो संसारमहण्णवम्मि सामण्णं ।
तं संजमं खु अबुहो णासेइ ससल्लमरणेण॥468॥
इस संसार महासागर में महाकष्ट से हो श्रामण्य ।
सशल्य मरण से नष्ट करे अज्ञानी यह दुर्लभ संयम॥468॥
अन्वयार्थ : भो मुने! इस जीव ने अनादि से संसारसमुद्र में परिभ्रमण करते हुए बहुत दु:ख से/कठिनता से मुनिपना पाया है । यह अज्ञानी शल्यसहित मरण करके संयम का नाश करता है, मुनिपना बिगाडता है, ऐसी दुर्लभता से प्राप्त संयम को बिगाडना महा-अनर्थ है ।
सदासुखदासजी