
जह णाम दव्वसल्ले अणुद्धुदे वेदणुद्दिदो होदि ।
तह भिक्खू वि ससल्लो तिव्वदुहट्टो भयोव्विग्गो॥469॥
जैसे द्रव्य शल्य1 अनिराकृत2 होने पर पीड़ित हो नर ।
वैसे तीव्र दुःखी, भय विचलित होता भाव शल्ययुत नर॥469॥
अन्वयार्थ : जैसे द्रव्य शल्य/काँटे जो पैर में लगे हुए नहीं निकालते तो वेदना से दु:खित होते हैं; वैसे ही जो साधु भावों की शल्य आलोचना करके नहीं निकालते तो वे संसार में बहुत दु:खी होते हैं तथा मेरी कौन-सी गति होगी? मैंने व्रत बिगाडे हैं - ऐसे भय से उद्वेग रूप भी रहता है ।
सदासुखदासजी