कंटकसल्लेण जहा वेधाणी चम्मखीलणाली य ।
रप्पइयजालगत्तागदो य पादो सडदि पच्छा॥470॥
ज्यों पग में काँटा लगने पर सबसे पहले होता छिद्र ।
फिर हो जाती पीप और बाँबी जैसा दुर्गन्धित छिद्र॥470॥

  सदासुखदासजी