एवं तु भावसल्लं लज्जागारवभएहिं पडिबद्धं ।
अप्पं पि अणुद्धरियं वदसीलगुणे वि णासेइ॥471॥
वैसे लज्जा गारव भय से भावशल्य नहिं करे विनष्ट ।
किंचित् भी यदि शल्य रहे तो, व्रत-गुण-शीलादिक हों नष्ट॥471॥
अन्वयार्थ : जैसे काँटे से अथवा बाँस इत्यादि की शल्य से पैर छिद गया है, विंध गया है, उसमें से यदि शल्य नहीं निकालते तो चमडी तथा नसों के जालों को बेधकर पैर में अनेक छिद्र हो जाते हैं और दुर्गंध खून-पीप पैदा हो जाने से पैर गल जाते हैं, सड जाते हैं; वैसे ही जो भावों की शल्य लज्जा से, अभिमान से तथा प्रायश्चित्त के भय से नहीं निकालते, वे साधु अपने अपराध को छिपाकर अपने ही व्रत, शील आदि सर्व गुणों का नाश करते हैं ।

  सदासुखदासजी