
तत्थ य कालमणंतं घोरमहावेदणासु जोणीसु ।
पच्चंतो पच्चंतो दुक्खसहस्साइ पप्पेदि॥473॥
और भयंकर भव-समुद्र की महावेदना योनि में ।
काल अनन्त भ्रमण करते-करते सहस्र विध दुःख भोगे॥473॥
अन्वयार्थ : पश्चात् भ्रष्ट हुआ है, रत्नत्रय के लाभ से ऐसा मुनि अनंतकाल पर्यंत संसारसमुद्र में परिभ्रमण करता हुआ पार नहीं होता है । कैसा है संसारसमुद्र? अति भयानक है, जन्मम रणरूप भँवर जिसमें तथा चौरासी लाख योनि-स्थान से व्याप्त है । वहाँ अनंतकाल पर्यंत घोर महावेदनारूप योनियों में पचता हुआ हजारों दु:खों को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी