तं न खु खमं पमादा मुहुत्तमवि अत्थिदुं ससल्लेण ।
आयरियपादमूले उद्धरिदव्वं हवदि सल्लं॥474॥
अतः न क्षणभर भी प्रमादवश शल्य सहित नहिं क्षपक रहे ।
निर्यापक के चरणकमल में रहकर अपनी शल्य हरे॥474॥
अन्वयार्थ : इसलिए अन्तर्मुहूर्त मात्र भी प्रमाद से शल्यसहित रहने में असमर्थ, ऐसे क्षपक वे आचार्य के चरणारविन्दों के निकट आकर शल्य दूर करने के योग्य होते हैं ।

  सदासुखदासजी