पं-सदासुखदासजी
तम्हा जिणवयणरुई जाइजरामरणदुक्खवित्तत्था ।
अज्जवमद्दणसंपण्णा भयलज्जाउ मोत्तूण॥475॥
अतः जिनागम के श्रद्धालु जन्म-जरा-मृतु दुःख से भीत ।
मुनि त्यागे भय लज्जा, मार्दव आर्जव से होवे भूषित॥475॥
सदासुखदासजी