उप्पाडित्ता धीरा मूलमसेसं पुणब्भवलयाए ।
संवेगजणियकरणा तरंति भवसायरमणंतं॥476॥
पुनर्जन्म की लता-मूल सम्पूर्ण शल्य को कर निर्मूल ।
भवभयजनित चरित्र ग्रहण कर क्षपक लहें भवदधि का कूल॥476॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र के वचनों में है रुचि जिनकी, जन्म, जरा, मरण से भयभीत हैं; आर्जव/ सरलता, मार्दव/कोमल परिणामों से सहित हैं, धीर, वीर हैं; संसार-परिभ्रमण के भय से उपजी है आत्महित करने में प्रवृत्ति जिनके ऐसे क्षपक हैं, वे गुरु द्वारा दिये गये प्रायश्चित्त के भय और लज्जा को त्यागकर और संसार में बारंबार उत्पत्ति होना - यही है बेल, उसके मूल भावों की शल्य को उखाडकर अनंतानंत संसाररूप समुद्र से तिरकर निर्वाण के पात्र होते हैं ।

  सदासुखदासजी