तह्मा खवएणाओपायविदंसिस्स पायमूलम्मि ।
अप्पा णिव्विसिदव्वो धुवा हु आराहणा तत्थ॥478॥
अतः अपाय-उपाय1 प्रदर्शक गुरु के पादमूल में वास ।
करे क्षपक जिससे हो उसको निश्चित रत्नत्रय का लाभ॥478॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार अपने दोष गुरुओं के पास प्रगट करना, यह आलोचना है । इसके करने में गुण प्रगट होते हैं और आलोचना नहीं करने में दोष प्रगट होते हैं । यदि गुरु नहीं बतायें तो क्षपक दोषों से परांगमुख नहीं होंगे और गुणरूप नहीं परिणमेंगे, इसलिए क्षपक को अपायोपायविदर्शी गुण के धारक जो आचार्य हैं, उनके चरणों के निकट अपने को स्थापन करना/वास करना योग्य है; क्योंकि अपायोपायविदर्शी गुण के धारक गुरुओं के निकट/पास में निश्चय से आराधना होती है ।
ऐसे सुस्थित नामक अधिकार में निर्यापकाचार्य के अष्टगुणों में अपायोपायविदर्शी नामक पाँचवाँ गुण पंद्रह गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी