पं-सदासुखदासजी
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अब निर्यापकाचार्य का अवपीडक नामक छठवाँ गुण बारह गाथाओं में कहते हैं -
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आलोचणगुणदोसे कोई सम्मं पि पण्णविज्जंतो ।
तिव्वेहिं गारवदिहिं सम्मं णालोचए खवए॥479॥
आलोचन के गुण-दोषों को भली-भाँति जाने तो भी ।
अति गारव के कारण कोई क्षपक न अपने दोष कहे॥479॥
सदासुखदासजी