
णिद्धं मधुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्जमेगंते ।
तो पल्हावेदव्वो खवओ सो पण्णवंतेण॥480॥
स्निग्ध मधुर हृदयानुप्रवेशी सुखद वचन कहकर एकान्त ।
अपना दोष न कहनेवाले मुनि को गुरुवर शिक्षा दे॥480॥
अन्वयार्थ : ऐसे आलोचना के गुण और दोष आचार्य के द्वारा सत्यार्थ दिखाने पर भी कोई क्षपक तीव्र गौरव/गारव से लज्जा, भयादि से सत्य आलोचना नहीं करें तो बुद्धिमान जो आचार्य, वे एकान्तस्थान में क्षपक को शिक्षा देते हैं । कैसी शिक्षा करते हैं? स्नेह भरी, कर्ण को मिष्ट, जो हृदय में प्रवेश कर जाये तथा आनंद करनेवाली ऐसी शिक्षा देते हैं ।
भो मुने! बहुत कठिनता से जो रत्नत्रय पाया है, उसके अतिचारों की आलोचना करने में सावधान हो जाओ । लज्जा तथा भय को प्राप्त मत होओ । माता-पिता समान जो गुरु, उनके समीप अपने दोष कहने में लज्जा आती है क्या? वात्सल्य गुण के धारक गुरु अपने शिष्य के दोष जगत में प्रगट करके धर्म की निंदा नहीं करायेंगे । पर का अपवाद करने से नीचगोत्र के कारण कर्मबंध नहीं करेंगे । इसलिए आलोचना करने में लज्जा मत करो । जैसे तुम्हारे रत्नत्रय की शुद्धि होगी और तपश्चरण का निर्वाह होगा; वैसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुकूल प्रायश्चित्त तुम्हें दिया जायेगा । इसलिए भय को त्याग कर सत्यार्थ आलोचना करो ।
सदासुखदासजी