
णिद्धं मधुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्जमेगंते ।
कोइत्तु पण्णविज्जंतओ वि णालोचेए सम्मं॥481॥
स्निग्ध मधुर हृदयानुप्रवेशी सुखद वचन कहकर एकान्त ।
समझायें आचार्य परन्तु क्षपक न अपने दोष कहे॥481॥
अन्वयार्थ : कोई क्षपक ऐसे होते हैं कि आचार्य द्वारा एकान्त में स्नेह रूप मधुर तथा हृदय में प्रवेश कर आनन्द देने वाले ऐसे वचनों द्वारा समझाये जाने पर भी सत्य आलोचना नहीं करते तो अवपीडक गुण के धारक गुरु क्या करते हैं?
सदासुखदासजी