
तो उप्पीलेदव्वा खवयस्सोप्पीलएण दोसा से ।
वामेइ मंसमुदरमवि गदं सीहो जह सियालं॥482॥
जैसे सिंह स्यार उदर से मांस पिण्ड को उगलाता ।
अवपीड़क आचार्य क्षपक के छिपे दोष को कहलाता॥482॥
अन्वयार्थ : मिष्ट वचनों द्वारा समझाये जाने पर भी क्षपक मायाचार छोडकर सत्य आलोचना नहीं करते, तो अवपीडक गुण के धारक आचार्य, क्षपक के दोषों को जबरदस्ती भय से बाहर निकलवाते हैं । जैसे सिंह अपनी जोरदार दहाड के द्वारा स्याल के पेट में पडे हुए मांस को भी तत्काल वमन कराता है, अत: सिंह को देखते ही स्याल खाये हुए मांस को तत्काल उगल देता है, वैसे ही तेजस्वी अवपीडक गुण के धारक आचार्य जिस समय क्षपक को पूछते हैं कि - हे मुने! यह दोष ऐसा ही है, सत्य कहो । तब तत्काल भयवान होकर मायाशल्य को निकालकर सत्य आलोचना करते हैं और यदि नहीं करते हैं तो उसका अवपीडक गुरु तिरस्कार भी करते हैं - हे मुने! हमारे संघ से निकल जाओ । मुझसेे तुम्हें क्या प्रयोजन है? जो अपने शरीर में लगे हुए मल को धोना चाहता है, वह निर्मल जल से भरे सरोवर को प्राप्त करेगा तथा महान रोग से ग्रस्त रोगी अपना रोग दूर करना चाहेगा तो प्रवीण वैद्य के पास जायेगा । वैसे ही जो रत्नत्रयरूप परम धर्म के अतिचार दूर करके उज्ज्वल होना चाहेगा, वह गुरुजनों का आश्रय लेगा । तुम्हें रत्नत्रय की शुद्धता करने में आदर नहीं है तो इस मुनिपने के व्रत धारण करने की विडंबना से क्या साध्य है? केवल चार प्रकार के आहार त्याग देने मात्र रूप सल्लेखना से क्या साध्य होगा? कर्म का संवर और निर्जरा तो कषाय सल्लेखना के अभाव बिना बाह्यक्रिया निष्फल है, इसलिए कषायोंं का निग्रह करना ही श्रेष्ठ है ।
कषायों में भी मायाकषाय अतिनिंद्य है, तिर्यंचगति को प्राप्त कराने में समर्थ है । जिसने मायाचार नहीं त्यागा, उसने संसार-समुद्र में प्रवेश किया । कैसा है संसार समुद्र? जिसमें से अनंतानंत काल में भी निकलना मुश्किल है और तुम्हारे मात्र वस्त्रत्याग करने से निर्ग्रंथपने का अभिमान वृथा है; क्योंकि वस्त्ररहित नग्न और शीत-उष्णादि परीषह को सहनेवाले तिर्यंच भी जगत में बहुत हैं । चतुर्दश प्रकार के अभ्यंतर परिग्रह के त्याग से ही निर्ग्रंथपना टिकता है और अभ्यंतर परिग्रह के त्याग के लिये ही दस प्रकार के बाह्य परिग्रह का त्याग करते हैं । मात्र जीवद्रव्य और पुद्गलद्रव्य की निकटता से ही कर्म बंध नहीं होता । जब कषायसहित राग-द्वेषरूप आत्मा के परिणाम होंगे, तब बंध होता है; इसलिए बंध का कारण कषाय ही है । अतिचार सहित दर्शन, ज्ञान, चारित्र मुक्ति का उपाय नहीं है, निरतिचार ही मोक्ष का मार्ग है, यह तुम्हारे सुनने में नहीं आया है क्या? और दर्शन-ज्ञान-चारित्र की निरतिचारता गुरुओं द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त के आचरण बिना नहीं होती और गुरु भी आलोचना किये बिना प्रायश्चित्त नहीं देते । इसलिए भो मुने! तुम दूरभव्य हो अथवा अभव्य हो । जो निकट भव्य होते तो ऐसी मायाशल्य क्यों रखते? अत: तुम्हारे समान मायाचारी मुनिजनों द्वारा वंदने योग्य नहीं है । जिसके लाभ में, अलाभ में, निंदा में, स्तवन में समान चित्त/समताभाव हो, वही श्रमण वंदने योग्य हैऔर तुम्हारे ऐसे भाव हैं कि हम दोषों की आलोचना करेंगे तो हमारी निंदा करेंगे, प्रशंसा नहीं करेंगे । इस अभिप्राय से यथार्थ आलोचना नहीं करते हो तो तुम्हारे श्रमणपना भी नहीं है, तब वंदने योग्य कैसे हुए? वंदने योग्य नहीं हो, इत्यादि वचनों से पीडा देकर दोषों को बाहर निकालते हैं । ऐसे अवपीडक गुरु की शरण ग्रहण करना योग्य है ।
सदासुखदासजी