
उज्जस्सी तेजस्सी वच्चस्सी पहिदकित्तियायरिओ ।
सीहाणुओ य भणिओ जिणेहिं उप्पीलगो णाम॥483॥
ओजस्वी तेजस्वी वर्चस्वी1 प्रसिद्ध ख्याति जिनकी ।
सिंह तुल्य आचार्य नाम उत्पीड़क कहते हैं जिनजी॥483॥
अन्वयार्थ : जो बलवान हो, वह परीषह, उपसर्ग में कायर नहीं होता और जो प्रतापवान हो, उनके वचनादि का कोई उल्लंघन करने में समर्थ नहीं होता । प्रभाववान हो, उन्हें देखते ही दोषसहित साधु काँपने लग जाते हैं तथा बडे-बडे विद्या के धारक नम्रीभूत हो जाते हैं और जिसकी जगत में कीर्ति विख्यात हो, जिसकी कीर्ति सुनते ही जिनके गुण का श्रद्धान दृढ हो जाये, सर्व जगत में बिना देखे ही जिनका वचन दूर देश से ही सभी प्रमाण कर लेवें, सिंह की तरह निर्भय हो, उनको जिनेन्द्र भगवान ने अवपीडक नाम कहा है ।
सदासुखदासजी