पं-सदासुखदासजी
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अब आगे कहते हैं कि जो हितु हो, वह जैसे हित होता जाने, वैसी प्रवृत्ति कराके हित में जोड देता है-
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पिल्लेदूण रडंत पि जहा बालस्स मुहं विदारित्ता ।
पज्जेइ घदं माया तस्सेव हिदं विचिंतंती॥484॥
जैसे बालक की हित चिन्ता करने में तत्पर माता ।
रोते बालक को पकड़े, मुँह फाड़े उसमें घी डाले॥484॥
सदासुखदासजी