तह आयरिओ वि अणुज्जयस्स खवयस्स दोसणीहरणं ।
कुणदि हिदं से पच्छा होहिदो कडु ओसहं वत्ति॥485॥
उसी तरह आचार्य, कुटिल मुनि के दोषों को दूर करे ।
जो कटु औषधि के समान पश्चात् उसे हितकारी हो॥485॥
अन्वयार्थ : जैसे बालक का हित चिंतवन करनेवाली माता, रोते हुए बालक को भी दबाकर और बालक का मुख खोलकर घी-दूधादि का पान कराती है । वैसे ही शिष्य का हित चिंतवन करनेवाले आचार्य भी मायाचार सहित क्षपक के मायाशल्य नामक दोष को बलात्कार/ जबरदस्ती से दूर करते हैं । वह दोष दूर करना, उन्हें कडवी औषधि की तरह पश्चात् हित करता है और जो गुरु शिष्य के दोष देखकर भी तिरस्कार नहीं करते हैं, मात्र मिष्ट वचन ही कहते हैं, उस गुरु को अच्छा नहीं जानना, वह ठग है ।

  सदासुखदासजी