
जिब्भाए वि लिहंतो ण भद्दओ जत्थ सारणा णत्थि ।
पाएण वि ताडिंतो स भद्दओ जत्थ सारणा अत्थि॥486॥
मृदुभाषी भी भद्र नहीं, यदि दोष निवारण नहीं करे ।
पद-ताड़न1 करने वाला वह भद्र, क्षपक के दोष हरे॥486॥
अन्वयार्थ : जो गुरु जिह्वा से तो मिष्ट वचन ही बोलते हैं, परंतु जो शिष्यों के दोषों का निवारण नहीं करते, वह गुरु सुन्दर/अच्छा नहीं है और जो चरणों से ताडना भी करते हों और जिसमें शिष्यों को दोषों से रोकना -निवारण करना विद्यमान है, वह गुरु भला/सुन्दर है ।
सदासुखदासजी