
सुलहा लोए आदठ्ठचिंतगा परहिदम्मि मुक्कधुरा ।
अ दट्ठं व परट्ठं चिंतंता दुल्लहा लोए ॥487॥
हैं स्व-कार्यरत, किन्तु आलसी पर-कायाब में, बहुत सुलभ ।
निज-पर कायाब की चिन्ता करनेवाले नर हैं दुर्लभ॥487॥
अन्वयार्थ : जो अपने प्रयोजन की भाँति अन्य जीवों के प्रयोजन की चिंता में भी उद्यमी हैं, ऐसे पुरुष इस लोक में दुर्लभ हैं, विरले हैं ।
सदासुखदासजी