
आदट्ठमेव चिंतेदुमुट्ठिदा जे परट्ठमवि लोगे ।
कडुप फरुसेहिं साहेंति ते हु अदिदुल्लहा लोए ॥488॥
जो स्वकार्य चिन्ता में रत रहकर भी पर के कार्य करें ।
कटु-कठोर वचनों से भी पर-हित साधें वे अति दुर्लभ हैं॥488॥
अन्वयार्थ : जो इस लोक में अपना प्रयोजन सिद्ध करने में उद्यमवंत हैं और अन्य का प्रयोजन कटुक वचन कहकर भी तथा कठोर वचन कहकर भी सिद्ध कर देते हैं, ऐसे पुरुष लोक में अति दुर्लभ हैं ।
सदासुखदासजी