
खवयस्य जइ ण दोसे उग्गालेइ सुहमेव इदरे वा ।
ण णियत्तइ सो तत्तो खवओ ण गुणे य परिणमइ॥489॥
यदि आचार्य क्षपक के सूक्ष्म-स्थूल दोष नहिं उगलावे2 ।
क्षपक दोष से मुक्त न होवे और गुणों में नहिं वर्ते॥489॥
अन्वयार्थ : जो आचार्य क्षपक को कठोर वचनादि से मायाचारादि सूक्ष्म दोष या स्थूल दोष नहीं उगलाते, वमन नहीं कराते तो क्षपक सूक्ष्म-स्थूल दोषों से भिन्न/रहित नहीं हो सकेगा और गुणों में प्रवृत्ति नहीं कर सकेगा । इसलिए अवपीडक गुण के धारक आचार्य ही दोषों से छुडाकर गुणों में प्रवर्तन कराते हैं ।
सदासुखदासजी