
जह धरिसिदो इमो तह अम्हं कारिज्ज धरिसरामि मोत्ति ।
सव्वो वि गणो विप्परिणसेज्ज छंडेज्ज वायरियं॥497॥
जैसे इसका दोष बताया वैसे कहे हमारा दोष ।
यह विचार सब मुनि गण त्यागें अथवा गुरु का त्याग करें॥497॥
अन्वयार्थ : जैसे इन्होंने क्षपक को दूषित बताकर तिरस्कृत किया, तैसे हमको भी तिरस्कृत करेंगे । इस तरह सम्पूर्ण गण/संघ आचार्य से भिन्न हो जाते हैं या आचार्य का त्याग कर देते हैं ।
सदासुखदासजी