
तह चेव पवयणं सव्वमेव विप्परिणयं भवे तस्य ।
तो से दिसावहारं करेज्ज णिज्जूहणं चावि॥498॥
सर्वमेव प्रवचन1 हो सकता है विरुद्ध आचायाब से ।
उनका भी परित्याग करे अथवा गण उनका पद छीने॥498॥
अन्वयार्थ : वैसे ही प्रवचन/चार प्रकार का सर्वसंघ या रत्नत्रय से विरुद्ध परिणति को प्राप्त हो तो आचार्य का त्याग करें तथा आचार्यपना बिगाड दें ।
सदासुखदासजी