
जदि धरिसणमेरिसयं करेदि सिस्स्स चेव आयरिओ ।
धिद्धि अपुठ्ठधम्मो समणोत्ति भणेज्ज मिच्छजणो ॥499॥
इसप्रकार अपने शिष्यों के दोष कहें सबसे आचार्य ।
मिथ्यादृष्टि लोग कहेंगे एेसे श्रमणों को धिक्कार॥499॥
अन्वयार्थ : जो आचार्य शिष्य की ऐसी अवज्ञा करें, ऐसा अपवाद करें । इसलिए धर्म की पुष्टता रहित ये मुनि हैं, इन्हें धिक्कार हो, धिक्कार हो! ऐसा मिथ्यादृष्टि जन कहते हैं ।
सदासुखदासजी