इच्चेवमादिदोसा ण होंति गुरुणो रहस्सधारिस्स ।
पुठ्ठेव अपुट्ठे वा अपरिस्साइस्स धीरस्स॥500॥
पूछे या बिन पूछे जो नहिं प्रकट करें शिष्यों का दोष ।
अपरिस्रावी हैं वे सूरि उनको लगें न ये सब दोष॥500॥
अन्वयार्थ : जो पूछने पर भी शिष्य के कहे दोष नहीं कहते और नहीं पूछने पर भी आलोचना में कहे दोष नहीं कहते, ऐसे जो रहस्य गुप्ति के धारक आचार्य हैं, उनके पूर्व में कहे दोष आदि नहीं होते ।
ऐसे सुस्थित नामक अधिकार में निर्यापकाचार्य के अष्टगुणों में अपरिस्रावी नामक सातवाँ गुण दस गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी