+ आगे निर्यापक नामक आठवाँ गुण बारह गाथाओं में कहते हैं- -
संथारभत्तपाणे अमणुण्णे वा चिरं व कीरंते ।
पडिचरगपमादेण य सेहाणमसंवुडगिराहिं॥501॥
संस्तर-अशन-पान में यदि होवे विलम्ब या हों प्रतिकूल ।
निर्यापक से हो प्रमाद तो क्षपक जाए मर्यादा भूल॥501॥

  सदासुखदासजी