पं-सदासुखदासजी
सीदुण्हछुहा तण्हाकिलामिदो तिव्ववेदणाए वा ।
कुविदो हवेज्ज खवओ मेरं वा भेत्तुमिच्छेज्ज॥502॥
शीत-उष्ण या भूख-प्यास की पीड़ा भी यदि होवे तीव्र ।
क्षपक कुपित होकर वांछा कर सकता अनुचित वर्तन की॥502॥
सदासुखदासजी