
णिव्ववएण तदो से चित्तं खवयस्स णिव्ववेदव्वं ।
अक्खोभेण खमाए जुत्तेण पणट्ठमाणेण॥503॥
तो निर्मानी धीर सूरि सन्तोष प्रदायक वचनों से ।
मर्यादा उल्लंघनकामी क्षुब्ध क्षपक को शान्त करें॥503॥
अन्वयार्थ : जो वैयावृत्त्य के, टहल के करने वाले परिचालक, उनके प्रमाद से संस्तर अमनोज्ञ हो गया हो, भोजन-पान अमनोज्ञ हुआ हो, संस्तरादि करने में विलम्ब किया हो, उससे तथा शिष्यों का संवर रहित वचनों से शीत, उष्ण, क्षुधा, तृषा आदि की बाधा से तथा तीव्र रोगादि की वेदना द्वारा यदि क्षपक कोप को प्राप्त हो जाये, व्रतों की मर्यादा एवं संन्यास में त्याग किया हो, उनकी मर्यादा भंग करने की इच्छा करने लगे, तब क्षोभ/आकुलता से रहित और क्षमा युक्त, मानरहित ऐसे निर्यापक आचार्य हैं, वे क्षपक के मन को प्रशांत करते हैं - वेदना रहित करते हैं, व्रतों में दृढ करते हैं, मर्यादा के भंग से उत्पन्न पाप से भयभीत करते हैं । वे निर्यापक गुण के धारक आचार्य होते हैं ।
सदासुखदासजी