
अंगसुदे य बहुविधे णो अंगसुदे य बहुविधविभत्ते ।
रदणकरंडयभूदो खुण्णो अणिओगकरणम्मि॥504॥
द्वादशांग अरु अंग-बाह्य के भेदों से श्रुत विविध प्रकार ।
अनुयोगों में कुशल जिनागम, रत्नों का अक्षय भंडार॥504॥
अन्वयार्थ : जो बहुत प्रकार का अंगश्रुत तथा बहुत प्रकार का नो-अंगश्रुत, इनमें रत्न रखने के पिटारे तुल्य हो । जैसे पिटारे में रत्न जिस प्रकार रखे हों, उसी प्रकार रखे रहते हैं, कमबढ नहीं होते, वैसे ही जिनके आत्मा ने अंगादि श्रुतज्ञान को धारण किया है, वह जैसा का तैसा हीनाधिकता रहित धारण किये रहते हैं, ऐसे निर्यापकगुण के धारी होते हैं । अनुयोग/ सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, अल्प-बहुत्व - इन अनुयोगों से जीवादि तत्त्वों को जानने में कुशल हों, प्रवीण हों, वे ही क्षपक को निर्विघ्न रूप से संसार-समुद्र से पार कराते हैं ।
सदासुखदासजी