+ आगे श्रुतज्ञान की महिमा कहते हैं - -
वत्ता कत्ता च मुणी विचित्तसुदधारओ विचित्तकहो ।
तह य अपायविदण्हू मइसंपण्णो महाभागो॥505॥
वक्ता कर्त्ता अरु विचित्र-श्रुत और कथा का जो ज्ञाता ।
बुद्धिमान वह महाभाग, होता अतिचारों का ज्ञाता॥505॥
अन्वयार्थ : निर्यापक गुरु कैसे होते हैं? वक्ता/पर के हृदय में अर्थ प्रवेश करा देने की सामर्थ्यरूप वक्तृत्व नामक गुण के धारक होते हैं । विनय और वैयावृत्त्य के कर्त्ता होते हैं, विचित्र श्रुत के धारक होते हैं । प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग - इन चारों अनुयोगों के अनुकूल जो विचित्र कथा, उनका निरूपण करने का सामर्थ्य है जिनका, ऐसे होते हैंऔर रत्नत्रय के अतिचार को जाननेवाले होते हैं, स्वाभाविक बुद्धि से संयुक्त होते हैं और महाभाग/स्ववश होते हैं ।

  सदासुखदासजी