
णिद्धं मधुरं गम्भीरं मणप्पसादणकरं सवणकंतं ।
देह कह णिव्ववगो सदीसमण्णाहरणहेउं॥507॥
स्निग्ध-मधुर-गम्भीर-कर्णप्रिय चित् प्रसन्न करनेवाले ।
श्रुत सुमिरन में कारण हों जो, निर्वापक गुरु वचन कहें॥507॥
अन्वयार्थ : निर्यापक गुरु और क्या करते हैं? पूर्व में संन्यास प्रारम्भ किया था, उसका दृष्टान्त हेतु से युक्त समस्त त्याग-संयम को ग्रहण कराके शिक्षा देते हैं । यदि क्षपक कुपित हुआ हो तो उपशमभाव को प्राप्त होनेवाली शिक्षा देते हैं, जिससे पूर्व में व्रत, संयम, नियम धारण करने की प्रतिज्ञा की थी, उसका स्मरण प्रगट हो जाये । किस प्रकार से कथा का उपदेश देते हैं, वह कहते हैं - प्रिय वचन की अधिकता से स्नेहरूप होती है । कठोरता रहितपने से मधुर होती है । अर्थ की दृढता से गंभीर होती है । मन को आह्लाद करनेवाली होती है । कर्ण को सुख देनेवाली होती है । ऐसी संयम की स्मृति करानेवाली शिक्षा देते हैं ।
सदासुखदासजी