पं-सदासुखदासजी
जह पक्खुभिदुम्मीए होदं रदणभरिदं समुद्दम्मि ।
णिज्जवओ धारेदि हु जिदकरणो बुद्धिसंपण्णो॥508॥
जैसे बुद्धिमान नाविक उत्तंग तरंगों से क्षोभित ।
जलनिधि में भी है सम्हालता पोत, रत्न से जो पूरित॥508॥
सदासुखदासजी