तह संजमगुणभरिदं परिस्सहुम्मीहिं खुभिदमाइद्धं ।
णिज्जवओ धारेदि हु महुरेहिं हिदोवदेसेहिं॥509॥
संयम गुण परिपूर्ण किन्तु परिषह लहरों से जो क्षोभित ।
क्षपक-पोत को मृदुवचनों से है सम्हालता निर्यापक॥509॥
अन्वयार्थ : जैसे अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त हुई है तरंग जिसमें ऐसा समुद्र, उसमें रत्नों का भरा जहाज, उसे निर्यापक जो खेवटिया, वही धारण करते हैं । कैसे हैं निर्यापक? जीती हैं इन्द्रियाँ जिनने । और कैसे हैं? बुद्धि से (बलवान बुद्धि) संयुक्त हैं । जैसे इन्द्रियों को जीतनेवाले और बुद्धिसंयुक्त, ऐसे खेवटिया चलायमान समुद्र में रत्नों से भरे जहाज की रक्षा करते हैं । वैसे ही निर्यापकाचार्य भी संयम गुण से भरे हुए जो तपस्वीरूपी जहाज, वे परीषहरूप लहरों से क्षोभ को प्राप्त हुए हैं, उसे मिष्ट और हितरूप उपदेशों से धारण करते हैं/रक्षा करते हैं ।

  सदासुखदासजी