
धिदिबलकरमादहिदं महुरं कण्णाहुदिं जदि ण देइ ।
सिद्धिसुहमावहंती चत्ता साराहणा होइ॥510॥
धृति1-बलकारी निज-हितकारी मधुर वार्ता नहीं कहें ।
यदि निर्यापक, तो मुनि शिवसुखकारी आराधन छोड़े॥510॥
अन्वयार्थ : जो धैर्यरूप बल को देनेवाली, आत्मा को हितरूप, मधुर और निर्वाण सुख को प्राप्त करानेवाली, ऐसी कर्ण में आहुति निर्यापक गुरु नहीं देवें तो आराधना छूट जायेगी, इसलिए परमहित के उपदेशक और जैसे-तैसे अनेक विघ्नों से रक्षा करके क्षपकरूप जहाज को संसार-समुद्र से पार कर देते हैं, ऐसे निर्यापक गुरु का ही आश्रय लेना श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी