+ अब कथन का उपसंहार करते हैं - -
इय णिव्ववओ खवयस्स होइ णिज्जावओ सदायरिओ ।
होइ य कित्ती पधिदा एदेहिं गुणेहिं जुत्तस्स॥511॥
इसप्रकार निर्वापक गुण से युक्त क्षपक के निर्यापक ।
इन गुण भूषित निर्यापक की कीर्ति जगत में हो व्यापक॥511॥
अन्वयार्थ : ऐसे निर्यापक गुण से सहित जो आचार्य, वे क्षपक को सदाकाल निर्यापक आचार्यपने से उपकारी होते हैं । जो आचारवानादि इतने गुणों से सहित हों, उनकी ही कीर्ति जगत में विख्यात होती है ।

  सदासुखदासजी