इय अठ्ठगुणोवेदो कसिणं आराधणं उवविधेदि ।
खवगो वि तं भयवदी, उवगूहदि जादसंवेगो॥512॥
आठ गुणों से युक्त सूरि सब आराधन को प्राप्त करें ।
भवभय-भीरु क्षपक भी वह भगवति1 आराधन प्राप्त करे॥512॥
अन्वयार्थ : ऐसे आचारवान, आधारवान, व्यवहारवान, प्रकर्त्ता, अपायोपायविदर्शी, अवपीडक, अपरिस्रावी, निर्यापक - इन अष्टगुणों सहित आचार्य हों, वे समस्त आराधना को प्राप्त करते हैं । क्षपक भी ऐसे गुरुओं के प्रसाद से संसार से उत्पन्न हुआ है भय जिनके, वही भगवती अर्थात् सकल बाधा निवारण करने से महातपोवती आराधना का आलिंगन करते हैं ।
इति सविचार भक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में नब्बे गाथा सूत्रों द्वारा सुस्थित नामक सत्तरहवाँ अधिकार पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी