+ आगे उपसंपत नामक अठारहवाँ अधिकार छह गाथाओं द्वारा वर्णित करते हैं - -
एवं परिमग्गित्ता णिज्जवयगुणेहिं जुत्तमायरियं ।
उवसंपज्जइ विज्जाचरणसमग्गो तगो साहू॥513॥
ज्ञान-चरण गुण युक्त क्षपक मुनि खोजे निर्यापक आचार्य ।
आचार्यत्व आदि गुण भूषित हो जो, आता उनके पास॥513॥
अन्वयार्थ : ऐसे ज्ञान-चारित्र का धारक क्षपक मुनि, वे इतने गुणों सहित निर्यापकाचार्य/ गुरुओं का अवलोकन/देखकर उनकी समीपता को प्राप्त होना ।

  सदासुखदासजी