
तियरणसव्वावासयपडिपुण्णं तस्स किरिय किरियम्मं ।
विणएणमंजलिकदो वाइयबसभं इमं भणदि॥514॥
सब आवश्यक त्रिधा2 पूर्णकर निर्यापक को नमन करे ।
हाथ जोड़ विनयांजलि करके उनसे एेसे वचन कहे॥514॥
अन्वयार्थ : आचार्य की समीपता प्राप्त करके, बाद में मन-वचन-काय से षडावश्यक क्रिया परिपूर्ण करके और कृतिकर्म/गुरुओं का स्तवन करके, दोनों हाथ जोडकर अंजुली करके आचार्य श्रेष्ठ, उनसे ऐसी विनती करते हैं -
सदासुखदासजी