+ आचार्य श्रेष्ठ, उनसे ऐसी विनती करते हैं - -
तुज्झेत्थ बारसंगसुदपारया सवणसंघणिज्जवया ।
तुज्झं खु पादमूले सामण्णं उज्जवेज्जाम्मि॥515॥
द्वादशांग श्रुत पारंगत हे! श्रमण संघ के निर्यापक ।
महा-श्रमण! तव चरण कमल में उद्योतित हो मम श्रामण्य॥515॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! आप द्वादशांग श्रुत के पारगामी हो और श्रमणसंघ का उद्धार करनेवाले हो; इसलिए आपके चरणारविंदों के निकट मुनिपने को उज्ज्वल करूँगा ।

  सदासुखदासजी