पव्वज्जादी सव्वं कादूणालोयणं सुपरिसुद्धं ।
दंसणणाणचरित्ते णिस्सल्लो विहरिदुं इच्छे॥516॥
अब तक दोष हुए जो उनका आलोचन निर्दाेष करूँ ।
शल्य रहित हो दर्शन-ज्ञान-चरित पालन करना चाहूँ॥516॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! जिस दिन से मैंने दीक्षा ग्रहण की है, उस दिन से लेकर आज पर्यंत भले प्रकार शुद्ध आलोचना के द्वारा और दर्शन, ज्ञान, चारित्र में नि:शल्य होकर प्रवर्तन करने की इच्छा करता हूँ ।

  सदासुखदासजी