
एवं कदे णिसग्गे तेरा सुविहिदेण वायओ भणइ ।
अणगार उत्तमठ्ठं साधेहि तुमं अविग्घेण॥517॥
चरितवान निर्भार क्षपक से कहते निर्यापक आचार्य ।
बिना विघ्न बाधा के साधो उत्तमार्थ1 तुम हे अनगार॥517॥
अन्वयार्थ : सुविहित/क्षपक को ऐसे त्याग करने में उद्यमी होते देखकर वाचक/आचार्य यह कहते हैं - हे अनगार! हे मुने! तुम निर्विघ्नता से उत्तम अर्थ जो चार आराधना, उसका साधन करो ।
सदासुखदासजी