
धण्णोसि तुमं सुविहिद एरिसओ जस्स णिच्छओ जाओ ।
संसारदुक्खमहणीं घेत्तुं आराहणपडायं॥518॥
हे सुविहित1 तुम धन्य-धन्य हो जो यह उत्तम किया विचार ।
भव दुःख नाशक आराधना पताका अपने कर में धार॥518॥
अन्वयार्थ : हे मुने! धन्य हो! जो तुमने संसार का नाश करने वाली आराधनारूप पताका ग्रहण करने का निश्चय किया ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में छह गाथाओं द्वारा उपसंपत नामक अठाहवाँ अधिकार पूर्ण हुआ ।
सदासुखदासजी