
अच्छाहि ताम सुविहिद वीसत्थो मा य होहि उव्वादो ।
पडिचरएहिं समंता इणमठ्ठं संपहारेमो॥519॥
हो विश्वस्त विराजो तब तक व्याकुलता नहिं चित में धार ।
परिचारक जन संग बैठकर इस प्रकरण पर करें विचार॥519॥
अन्वयार्थ : हे मुने! इतने समय तक विश्वास रूप रहो, व्याकुलचित्त मत होओ । जब तक हम वैयावृत्त्य करनेवालों को या प्रयोजन का निश्चय कर लेवें, तब तक धैर्य रखना ।
सदासुखदासजी