तो तस्स उत्तमठ्ठे करणुच्छाहं पडिच्छदि विदण्हू ।
खीरोदणदव्वुग्गहदुगुंछणाए समाधीए॥520॥
फिर मार्गज्ञ2 परीक्षा करते, मुनि का उतमार्थ3 उत्साह ।
भोजन की लोलुपता है या नहीं, समाधि निमित्त विचार॥520॥
अन्वयार्थ : उसके बाद, मार्ग को जानने वाले जो आचार्य हैं, वे क्षपक को रत्नत्रय की आराधना करने में उत्साह की परीक्षा करते हैं कि इनके आराधना करने में उत्साह है या नहीं? तथा क्षीर/दूध, ओदनादि/चावलादि मनोज्ञ आहार में लोलुपता है या ग्लानि है? ऐसे परीक्षा करते हैं ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यान मरण के चालीस अधिकारों में परीक्षा नामक अधिकार दो गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी