+ आगे प्रतिलेखन नामक बीसवाँ अधिकार दो गाथाओं में कहते हैं - -
खवयस्सुवसंपण्णस्स तस्स आराधणा अविक्खेवं ।
दिव्वेण णिमित्तेण य पडिलेहदि अप्पमत्तो सो॥521॥
खवयस्सुवसंण्णिस्स तस्स आराधणा एवक्खविं ।
ेदव्वणि ेणेमत्तणि य िेडलहिेद अप्मित्ताि साि॥521॥
अन्वयार्थ : और जो आचार्य हैं, वे आराधना करने के लिये आये हुए क्षपक की आराधना निर्विघ्न होने के लिए दिव्य/निमित्तज्ञान से सावधान होकर अवलोकन करते हैं । इस क्षपक की आराधना निर्विघ्न होती है या नहीं होती है - ऐसा निमित्तज्ञान से अवलोकन करते हैं ।

  सदासुखदासजी